पाँचवे दिन, जीवन के विविध और विभिन्न रूप अलग-अलग तरीकों से सृष्टिकर्ता के अधिकार को प्रदर्शित करते हैं

27.03.2020

पवित्र-शास्त्र कहता है, "फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'जल जीवित प्राणियों से बहुत ही भर जाए, और पक्षी पृथ्वी के ऊपर आकाश के अन्तर में उड़ें।' इसलिये परमेश्‍वर ने जाति जाति के बड़े बड़े जल-जन्तुओं की, और उन सब जीवित प्राणियों की भी सृष्‍टि की जो चलते फिरते हैं जिन से जल बहुत ही भर गया, और एक एक जाति के उड़नेवाले पक्षियों की भी सृष्‍टि की: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है" (उत्पत्ति 1:20-21)। पवित्र-शास्त्र साफ-साफ कहता है कि इस दिन, परमेश्वर ने जल के जन्तुओं और आकाश के पक्षियों को बनाया, कहने का तात्पर्य है कि उसने विभिन्न प्रकार की मछलियों और पक्षियों को बनाया और उनकी प्रजाति के अनुसार उन्हें वर्गीकृत किया। इस तरह, परमेश्वर की सृष्टि से पृथ्वी, आकाश और जल समृद्ध हो गए ...

जैसे ही परमेश्वर के वचन कहे गए, नई ज़िन्दगियाँ, हर एक अलग आकार में, सृष्टिकर्ता के वचनों के मध्य एकदम से जीवित हो गईं। वे इस संसार में अपने स्थान के लिए एक-दूसरे को धकेलते, कूदते और आनंद से खेलते हुए आ गए...। हर प्रकार एवं आकार की मछलियाँ जल के आर-पार तैरने लगीं और सभी किस्मों की सीप वाली मछलियाँ रेत में उत्पन्न होने लगीं, कवचधारी, सीप वाली और बिना रीढ़ वाले जीव-जन्तु, चाहे बड़े हों या छोटे, लम्बे हों या ठिगने, विभिन्न रूपों में जल्दी से प्रगट हो गए। विभिन्न प्रकार के समुद्री पौधे शीघ्रता से उगना शुरू हो गए, विविध प्रकार के समुद्री जीवन के बहाव में बहने लगे, लहराते हुए, स्थिर जल को उत्तेजित करते हुए, मानो उनसे कहना चाहते हैं: नाचो! अपने मित्रों को लेकर आओ! क्योंकि अब तुम लोग कभी अकेले नहीं रहोगे! उस घड़ी जब परमेश्वर के द्वारा बनाए गए जीवित प्राणी जल में प्रगट हुए, प्रत्येक नए जीवन ने उस जल में जीवन-शक्ति डाल दी जो इतने लम्बे समय से शांत था और एक नए युग का सूत्रपात किया...। और तब से, वे एक-दूसरे के आस-पास रहने लगे और बिना किसी भेदभाव के एक-दूसरे से सहभागिता करने लगे। जल के भीतर जो भी जीवधारी थे, जल उनका पोषण करने लगा, और प्रत्येक जीवन, जल और उसके पोषण के कारण अस्तित्व में बना रहा। प्रत्येक जीव ने दूसरे को जीवन दिया, हर एक ने, उसी रीति से, सृष्टिकर्ता की सृष्टि की अद्भुतता, महानता और सृष्टिकर्ता के अधिकार और अद्वितीय सामर्थ्‍य की गवाही दी ...

जैसे समुद्र अब शांत न रहा, उसी प्रकार जीवन ने आकाश को भरना प्रारम्भ कर दिया। एक के बाद, छोटे-बड़े पक्षी, भूमि से आकाश में उड़ने लगे। समुद्र के जीवों से अलग, उनके पास पंख और पर थे जो उनके दुबले और आकर्षक रूप को ढंके हुए थे। वे अपने पंखों को फड़फड़ाते हुए, गर्व और अभिमान से अपने परों के आकर्षक लबादे को और अपनी विशेष क्रियाओं और कुशलताओं को प्रदर्शित करने लगे जिन्हें सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें प्रदान किया गया था। वे स्वतन्त्रता के साथ हवा में लहराने लगे और कुशलता से आकाश और पृथ्वी के बीच, घास के मैदानों और जंगलों के आर-पार यहाँ वहाँ उड़ने लगे...। वे हवा के प्रिय थे, वे हर चीज़ के प्रिय थे। वे जल्द ही स्वर्ग और पृथ्वी के बीच में एक सेतु बनकर सभी चीज़ों तक संदेश पहुँचाने वाले थे...। वे गीत गाने लगे, आनंद के साथ यहाँ-वहाँ झपट्टा मारने लगे, वे हर्षोल्लास एवं हँसी लेकर आए, उन्होंने कभी ख़ाली पड़े संसार में कम्पन पैदा कर दिया...। उन्होंने अपने स्पष्ट एवं मधुर गीतों से और अपने हृदय के शब्दों से उस जीवन के लिए सृष्टिकर्ता की प्रशंसा की जो उसने उन्हें दिया था। उन्होंने सृष्टिकर्ता की पूर्णता और अद्भुतता को प्रदर्शित करने के लिए हर्षोल्लास के साथ नृत्य किया, और वे उस विशेष जीवन के द्वारा जो सृष्टिकर्ता ने उन्हें दिया था, उसके अधिकार की गवाही देने में अपने सम्पूर्ण जीवन को समर्पित कर देंगे ...

इसके बावजूद कि वे जल में थे या आकाश में, सृष्टिकर्ता की आज्ञा के द्वारा, जीवित प्राणियों की यह अधिकता जीवन के विभिन्न रूपों में मौजूद थी, और सृष्टिकर्ता की आज्ञा के द्वारा, वे अपनी-अपनी प्रजाति के अनुसार इकट्ठे हो गए-और यह व्यवस्था और यह नियम किसी भी जीवधारी के लिए अपरिवर्तनीय था। और उनके लिए सृष्टिकर्ता के द्वारा जो भी सीमाएँ बनाई गई थीं उन्होंने कभी भी उसके पार जाने की हिम्मत नहीं की और न ही वे ऐसा करने में समर्थ थे। जैसा सृष्टिकर्ता के द्वारा नियुक्त किया गया था, उसके अनुसार वे जीते और बहुगुणित होते रहे और सृष्टिकर्ता के द्वारा बनाए गए जीवन-क्रम और व्यवस्था का कड़ाई से पालन करते रहे और सजगता से उसकी अनकही आज्ञाओं, स्वर्गीय आदेशों और नियमों में बने रहे जो उसने उन्हें तब से लेकर आज तक दिये थे। वे सृष्टिकर्ता से अपने एक विशेष अन्दाज़ में बात करते थे और सृष्टिकर्ता के अर्थ की प्रशंसा करते और उसकी आज्ञा मानते थे। किसी ने कभी भी सृष्टिकर्ता के अधिकार का उल्लंघन नहीं किया और उनके ऊपर उसकी संप्रभुता और आज्ञाओं का उपयोग उसके विचारों के तहत हुआ था; कोई वचन नहीं दिए गए थे, परन्तु वह अधिकार जो सृष्टिकर्ता के लिए अद्वितीय था उसने ख़ामोशी से सभी चीज़ों का नियन्त्रण किया जिसमें भाषा की कोई क्रिया नहीं थी और जो मानवजाति से भिन्न था। इस विशेष रीति से उसके अधिकार के इस्तेमाल ने मनुष्य को नया ज्ञान प्राप्त करने के लिए बाध्य किया और सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार की एक नई व्याख्या की। यहाँ तुम्हें एक बात बता दूँ कि इस नए दिन में, परमेश्वर के अधिकार के इस्तेमाल ने एक बार और सृष्टिकर्ता की अद्वितीयता का प्रदर्शन किया।

आगे, हम पवित्र-शास्त्र के इस अंश के अंतिम वाक्य पर एक नज़र डालेंगे: "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।" तुम लोग इसका अर्थ क्या लगाते हो? इन वचनों में परमेश्वर की भावनाएं भरी हैं। परमेश्वर ने उन सभी चीज़ों को देखा जिन्हें उसने बनाया था जो उसके वचनों के कारण अस्तित्व में आईं और बनी रहीं और धीरे-धीरे परिवर्तित होने लगीं। उस समय, परमेश्वर ने अपने वचनों के द्वारा जो विभिन्न चीज़ें बनाई थीं, और जिन विभिन्न कार्यों को पूरा किया था, क्या वह उनसे सन्तुष्ट था? उत्तर है कि "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।" तुम लोगों को क्या लगता है? इससे क्या प्रकट होता है कि "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।"? यह किसकी ओर संकेत करता है? इसका अर्थ है कि परमेश्वर ने जो योजना बनाई थी और जो निर्देश दिये थे उन्हें और उन उद्देश्यों को पूर्ण करने के लिए, जिन्हें पूरा करने की उसने व्यवस्था की थी, परमेश्वर के पास सामर्थ्‍य और बुद्धि थी। जब परमेश्वर ने हर एक कार्य को पूरा कर लिया, तो क्या वह दु:खी हुआ? उत्तर अभी भी यही है "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।" दूसरे शब्दों में, उसने कोई खेद महसूस नहीं किया, बल्कि वह सन्तुष्ट था। इसका मतलब क्या है कि उसे कोई खेद महसूस नहीं हुआ? इसका मतलब है कि परमेश्वर की योजना पूर्ण है, उसकी सामर्थ्‍य और बुद्धि पूर्ण है, और यह कि सिर्फ उसकी सामर्थ्‍य के द्वारा ही ऐसी पूर्णता को प्राप्त किया जा सकता है। जब कोई मुनष्य कार्य करता है, तो परमेश्वर के समान, क्या वह देख सकता है, कि वह अच्छा है? क्या हर काम जो मनुष्य करता है उसमें पूर्णता होती है? क्या मनुष्य किसी काम को एक ही बार में पूरी अनंतता के लिए पूरा कर सकता है? जैसा कि मनुष्य कहता है, "कुछ भी पूर्ण नहीं होता, बस थोड़ा बेहतर होता है," ऐसा कुछ भी नहीं है जो मनुष्य करे और वह पूर्णता को प्राप्त कर ले। जब परमेश्वर ने देखा कि जो कुछ उसने बनाया और पूर्ण किया वह अच्छा है, परमेश्वर के द्वारा बनाई गई हर वस्तु उसके वचन के द्वारा स्थिर हुई, कहने का तात्पर्य है कि, जब "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है," तब जो कुछ भी उसने बनाया उसे चिरस्थायी रूप में स्वीकृति मिल गई, उनकी किस्मों के अनुसार उन्हें वर्गीकृत किया गया, और उन्हें पूरी अनंतता के लिए एक दृढ़ स्थिति, उद्देश्य, और कार्यप्रणाली दी गई। इसके अतिरिक्त, सब वस्तुओं के बीच उनकी भूमिका, और वह यात्रा जिन से उन्हें परमेश्वर की सभी वस्तुओं के प्रबन्धन के दौरान गुज़रना था, उन्हें परमेश्वर के द्वारा पहले से ही नियुक्त कर दिया गया था और वे बदलने वाले नहीं थे। यह सृष्टिकर्ता द्वारा सभी वस्तुओं को दिया गया स्वर्गीय नियम था।

"परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है," इन सामान्य, कम महत्व के शब्दों की कई बार उपेक्षा की जाती है, परन्तु ये स्वर्गीय नियम और स्वर्गीय आदेश हैं जिन्हें सभी प्राणियों को परमेश्वर के द्वारा दिया गया है। यह सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक और मूर्त रूप है, जो अधिक व्यावहारिक और अति गंभीर है। अपने वचनों के जरिए, सृष्टिकर्ता न केवल वह सब-कुछ हासिल करने में सक्षम हुआ जिसे उसने हासिल करने का बीड़ा उठाया था, और वह सब-कुछ प्राप्त किया जिसे वह प्राप्त करने निकला था, बल्कि जो कुछ भी उसने सृजित किया था, उसका नियन्त्रण कर सकता था, और जो कुछ उसने अपने अधिकार के अधीन बनाया था उस पर शासन कर सकता था और इसके अतिरिक्त, सब-कुछ क्रमानुसार और निरन्तर बने रहने वाला था। सभी वस्तुएँ उसके वचन के द्वारा जीवित हुईं और मर भी गईं और उसके अतिरिक्त उसके अधिकार के कारण वे उसके द्वारा बनाई गई व्यवस्था के मध्य अस्तित्व में बनी रही और कोई भी वस्तु छूटी नहीं! यह व्यवस्था बिलकुल उसी घड़ी शुरू हो गई थी जब "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है," और वह बना रहेगा और जारी रहेगा और परमेश्वर की प्रबंधकीय योजना के लिए उस दिन तक कार्य करता रहेगा जब तक वह सृष्टिकर्ता के द्वारा रद्द न कर दिया जाए! सृष्टिकर्ता का अद्वितीय अधिकार न केवल सब वस्तुओं को बनाने और सब वस्तुओं के अस्तित्व में आने की आज्ञा की काबिलियत में प्रकट हुआ, बल्कि सब वस्तुओं पर शासन करने और सब वस्तुओं पर संप्रभुता रखने और सब वस्तुओं में चेतना और जीवन देने और इसके अतिरिक्त, सब वस्तुओं को पूरी अनंतता के लिए बनाने की उसकी योग्यता में भी प्रगट हुआ था जिसे वह अपनी योजना में बनाना चाहता था ताकि वे एक ऐसे संसार में प्रगट हो सकें और अस्तित्व में आ जाएँ जिन्हें उसके द्वारा एक पूर्ण आकार और एक पूर्ण जीवन संरचना और एक पूर्ण भूमिका में बनाया गया था। यह भी इस तरह से सृष्टिकर्ता के विचारों में प्रकट हुआ जो किसी विवशता के अधीन नहीं था और समय, अंतरिक्ष और भूगोल के द्वारा सीमित नहीं किए गए थे। उसके अधिकार के समान, सृष्टिकर्ता की अद्वितीय पहचान अनंतकाल से लेकर अनंतकाल तक अपरिवर्तनीय बनी रहेगी। उसका अधिकार सर्वदा उसकी अद्वितीय पहचान का एक निरूपण और प्रतीक बना रहेगा और उसका अधिकार हमेशा उसकी अद्वितीय पहचान के अगल-बगल बना रहेगा!

स्रोत: https://hi.bible-nl.org/

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