प्रत्येक चीज़ जिसके बारे में हम बात कर चुके हैं वह परमेश्वर के स्वभाव, और लोगों, मामलों, और चीज़ों के प्रति उसके रवैया से संबंधित है। स्वाभाविक रूप से, ऊपर दिए गए दोनों अंश अपवाद नहीं हैं। क्या तुम लोगों ने पवित्रशास्त्र के इन दोनों अंशों में किसी चीज़ पर ध्यान दिया? कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर के क्रोध को देखते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर के स्वभाव के उस पक्ष को देखते हैं जो मनुष्यजाति से अपमान को सहन नहीं कर सकता है, और यह कि यदि लोग ऐसा कुछ करते हैं जिससे परमेश्वर की ईशनिंदा होती है, तो वे उसकी क्षमा को प्राप्त नहीं करेंगे। इस तथ्य के बावजूद कि लोग इन दोनों अंशों में परमेश्वर के क्रोध और उसकी असहिष्णुता को देखते और महसूस करते हैं, तब भी उसका रवैया सचमुच में उनकी समझ में नहीं आता है। ये दोनों अंश उन लोगों के प्रति परमेश्वर के सच्चे रवैये और दृष्टिकोण के निहितार्थ से युक्त हैं जो उसकी ईशनिंदा और उसे क्रोधित करते हैं। पवित्रशास्त्र का यह अंश उसके रवैये और दृष्टिकोण के सच्चे अर्थ को धारण करता हैः "जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" जब लोग परमेश्वर की ईशनिंदा करते हैं, जब वे उसे क्रोधित करते, तो वह एक निर्णय जारी करता है, और यह निर्णय उसका अंतिम परिणाम होता है। यह बाइबल मे इस प्रकार से वर्णित हैः "इसलिये मैं तुम से कहता हूँ कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी" (मत्ती 12:31), और "हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय!" (मत्ती 23:13)। हालाँकि, यह बाइबल में दर्ज है कि उन शास्त्रियों और फरीसियों का, और साथ ही उन लोगों का क्या परिणाम हुआ था जिन्होंने प्रभु यीशु के द्वारा इन बातों को कहे जाने के बाद कहा था कि वह पागल है? क्या यह दर्ज है कि उन्होंने किसी प्रकार का दण्ड सहा था या नहीं? यह निश्चित है कि यह दर्ज नहीं था। यहाँ यह कहना कि "दर्ज नहीं था" क्या यह कहना नहीं है कि इसे दर्ज नहीं किया गया था, बल्कि वास्तव मे वहाँ कोई परिणाम नहीं था जिसे मनुष्य की आँखों से देखा जा सकता था। यह "दर्ज नहीं था" एक मसले को स्पष्ट करता है, अर्थात् कुछ चीज़ों को सँभालने के लिए परमेश्वर की रवैया और सिद्धांत। परमेश्वर का उन लोगों के साथ व्यवहार जो उसकी निंदा करते हैं या उसका प्रतिरोध करते हैं उन लोगों के साथ भी उसका व्यवहार जो उसे बदनाम करते हैं-जो लोग जानबूझकर उस पर हमला करते हैं, उसे बदनाम करते हैं, और उसे कोसते हैं-वह उनकी ओर आँख या कान बंद नहीं करता है। उनके प्रति उसका एक स्पष्ट रवैया होता है। वह इन लोगों से घृणा करता है, अपने हृदय में उनकी निन्दा करता है। यहाँ तक कि उनके परिणाम की खुल कर घोषणा भी करता है, ताकि लोग जानें कि जो उसकी निंदा करते हैं उनके प्रति उसका एक स्पष्ट रवैया है, और ताकि वे जानें कि वह उनका कैसा परिणाम निर्धारित करता है। हालाँकि, परमेश्वर के इन बातों को कहने के बाद, अभी भी लोग शायद ही उस सच्चाई को देख सकते हैं कि परमेश्वर किस प्रकार ऐसे लोगों को सँभालेगा, और वे परमेश्वर के परिणामों के पीछे के सिद्धांतों, उनके लिए उसके निर्णय को नहीं समझ सकते हैं। अर्थात्, मनुष्यजाति उस विशेष रवैये और पद्धतियों को नहीं देख नहीं सकती है जो उन्हें सँभालने के लिए परमेश्वर के पास है। इसका चीज़ों को करने के परमेश्वर के सिद्धांतों से संबंध है। कुछ लोगों के दुष्ट व्यवहार से निपटने के लिए परमेश्वर तथ्यों के आगमन का उपयोग करता है। अर्थात्, वह उनके पाप की घोषणा नहीं करता है और उनके परिणाम निर्धारित नहीं करता है, बल्कि उन्हें दण्डित किए जाने, और उनका उचित प्रतिफल प्राप्त करने की अनुमति देने के लिए वह प्रत्यक्ष रूप से तथ्यों के आगमन का उपयोग करता है। जब ये तथ्य घटित होते हैं, तो लोगों की देह कष्ट भुगतती है; यह सब कुछ ऐसा है जिसे मनुष्य की आँखों से देखा जा सकता है। कुछ लोगों के दुष्ट व्यवहार से निपटते समय, परमेश्वर बस वचनों से शाप देता है, परन्तु साथ ही, परमेश्वर का क्रोध उनके ऊपर पड़ता है, और वह दण्ड जिसे वे प्राप्त करते हैं वह कुछ ऐसा हो सकता है जिसे लोग देख नहीं सकते हैं, परन्तु इस प्रकार का परिणाम उन परिणामों से कहीं ज़्यादा गंभीर हो सकता है जिसे लोग देख सकते हैं कि उन्हें दण्डित किया या मारा जा रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उस परिस्थिति के अन्तर्गत जिसमें परमेश्वर ने यह निर्धारित किया है कि इस प्रकार के व्यक्तियों को बचाना नहीं है, और उन पर अब और कोई दया और सहिष्णुता नहीं दिखानी है, उन्हें कोई अवसर अब और नहीं देने हैं, उनके लिए उसका रवैया उन्हें अलग कर देने की होता है। "अलग कर देने" का अर्थ क्या है? अपने आप में इस शब्दावली का अर्थ है किसी चीज़ को एक ओर रखना, इस पर अब और कोई ध्यान नहीं देना। यहाँ, जब परमेश्वर "अलग कर देता है" तो इसके अर्थ की दो भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ होती हैं: पहली व्याख्या है कि उसने उस व्यक्ति के जीवन, और उस व्यक्ति की हर चीज़ को शैतान को दे दिया है ताकि वह उसके साथ निपटे। परमेश्वर अब ओर उत्तरदायी नहीं होगा तथा अब और उसका प्रबन्धन नहीं करेगा। चाहे वे व्यक्ति पागल या मूर्ख हो जाएँ, और चाहे जीवित रहें या मर जाएँ, या भले ही वे अपने दण्ड के लिए नरक में उतर जाएँ, इससे परमेश्वर का कोई लेन-देना नहीं होगा। इसका मतलब होगा कि उस प्राणी का परमेश्वर के साथ कोई संबंध नहीं होगा। दूसरी व्याख्या है कि परमेश्वर ने यह निर्धारित किया है कि वह स्वयं इस व्यक्ति के साथ, अपने हाथों से, कुछ करना चाहता है। यह संभव है कि वह इस प्रकार के व्यक्ति की सेवा का उपयोग करेगा, या यह कि वह इस व्यक्ति को एक विषम तुलना के रूप में उपयोग करेगा। यह संभव है कि इस प्रकार के व्यक्ति से निपटने के लिए परमेश्वर के पास एक विशेष तरीका होगा, उसके साथ व्यवहार करने का एक विशेष तरीका होगा-बिल्कुल पौलुस के समान। यह परमेश्वर के हृदय का सिद्धांत और उसका रवैया है कि उसने इस प्रकार के व्यक्ति से किस तरह निपटना निर्धारित किया है। इसलिए जब लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, और उसे बदनाम करते हैं और उसकी ईशनिंदा करते हैं, तो यदि वे उसके स्वभाव को भड़काते हैं, या यदि वे परमेश्वर की सहनशीलता की सीमा तक पहुँच जाते हैं, तो परिणाम अकल्पनीय होते हैं। सबसे कठोर परिणाम यह होता है कि परमेश्वर हमेशा के लिए उनकी ज़िन्दगियों और उनकी हर चीज़ को शैतान को सौंप देता है। वे पूरी अनंतता तक क्षमा नहीं किए जाएँगे। इसका अर्थ है कि ऐसे व्यक्ति शैतान के मुँह का निवाला, और उसके हाथ का खिलौना बन चुके हैं, और उस समय के बाद से परमेश्वर का उनके साथ कुछ लेना-देना नहीं है। क्या तुम लोग कल्पना कर सकते हो कि जब शैतान ने अय्यूब को प्रलोभित किया था तो यह किस प्रकार की दुर्गति थी? इस शर्त के अधीन जिसमें शैतान को अय्यूब के जीवन को नुकसान पहुँचाने की अनुमति नहीं थी, अय्यूब ने तब भी बड़ी कठिन पीड़ा सही थी। और क्या शैतान के उन विध्वंसों की कल्पना करना और भी अधिक कठिन नहीं है जिसके अधीन किसी व्यक्ति को कर दिया जाएगा, जिसे पूर्णत: शैतान को सौंपा जा चुका है, जो पूर्णत: शैतान के चंगुल में है, जिसने परमेश्वर की देखरेख और करुणा को पूर्णत: गँवा दिया है, जो सृजनकर्ता के शासन के अधीन अब और नहीं है, जिससे परमेश्वर की आराधना करने का अधिकार, और परमेश्वर के शासन के अधीन एक प्राणी होने का अधिकार छीना जा चुका है, जिसका रिश्ता सृष्टि के प्रभु के साथ पूर्णत: विच्छेद कर दिया गया है? शैतान के द्वारा अय्यूब की प्रताड़ना कुछ ऐसी ही थी जिसे मनुष्य की आँखों से देखा जा सकता था, परन्तु यदि परमेश्वर किसी व्यक्ति के जीवन को शैतान को सौंप देता है, तो इसका परिणाम कुछ ऐसा होगा जिसके बारे में कोई कल्पना नहीं कर सकता है। यह बस कुछ लोगों का एक गाय, या एक गधे के रूप में फिर से जन्म लेने, या कुछ लोगों पर अशुद्ध, दुष्ट आत्माओं के द्वारा कब्जा कर लिए जाने, इत्यादि के समान है। यह कुछ लोगों का परिणाम, अन्त है जिन्हें परमेश्वर के द्वारा शैतान को सौंपा जाता है। बाहरी तौर पर, ऐसा दिखाई देता है जैसे कि जिन लोगों ने प्रभु यीशु का उपहास किया था, उसे बदनाम किया था, उसकी निंदा की थी, और उसकी ईशनिन्दा की थी, उन्होंने कोई परिणाम नहीं भुगता। हालाँकि, सच्चाई यह है कि हर एक चीज़ से निपटने की परमेश्वर का एक रवैया है। परमेश्वर जिस प्रकार हर तरह के लोगों से निपटता है उसके परिणाम को लोगों को बताने के लिए हो सकता है कि वह स्पष्ट भाषा का उपयोग न करे। कभी-कभी वह प्रत्यक्ष रूप से बात नहीं करता है, परन्तु वह चीज़ों को प्रत्यक्ष रूप से करता है। यह कि वह इसके बारे में बात नहीं करता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि इसका कोई परिणाम नहीं है-यह संभव है कि परिणाम बहुत ही ज़्यादा गंभीर हो। प्रकट रूप से देखने से, ऐसा लगता है कि परमेश्वर अपने रवैये को प्रकट करने के लिए कुछ लोगों से बात नहीं करता है; वस्तुतः परमेश्वर लम्बे समय तक उन पर कोई ध्यान देना नहीं चाहा है। वह उनको अब और देखना नहीं चाहता है। उनके द्वारा की गई चीज़ों, उनके व्यवहार की वजह से, और उनकी प्रकृति और उनके सार की वजह से, परमेश्वर केवल इतना चाहता है कि वे उसकी नज़रों से ओझल हो जाएँ, उन्हें सीधे शैतान को सौंप देना चाहता है, उनकी आत्मा, प्राण, और शरीर को शैतान को देना चाहता है, शैतान को जो चाहे वह करने देना चाहता है। यह स्पष्ट है कि परमेश्वर किस हद तक उनसे नफ़रत करता है, वह किस हद तक उनसे उकता गया है। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर को इस हद तक क्रोधित कर देता है कि परमेश्वर उन्हें दुबारा देखना भी नहीं चाहता, कि वह उन्हें पूर्णत: छोड़ देगा, उस हद तक क्रोधित कर देता है कि परमेश्वर स्वयं उनसे निपटना भी नहीं चाहता है-यदि यह उस स्थिति तक पहुँच जाता है कि वह इसके लिए उसे शैतान को सौंप देगा ताकि वह जैसा चाहे वैसा करे, और वह शैतान को उस पर नियंत्रण करने, उसे भस्म करने, और जैसा चाहे वैसा व्यवहार करने देगा-तो ऐसा व्यक्ति पूर्णत: समाप्त हो जाता है। मनुष्य होने का उसका अधिकार स्थायी रूप से रद्द कर दिया गया है, और एक प्राणी के रूप में उसका अधिकार समाप्त हो गया है। क्या यह सर्वाधिक गंभीर परिणाम नहीं है?
उपरोक्त सभी इन वचनों की पूर्ण व्याख्या हैः "उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा," और यह पवित्रशास्त्र के इन अंशों पर एक सरल समीक्षा भी है। मुझे लगता है कि अब तुम लोगों के पास इन बातों की समझ है!
स्रोत: यीशु मसीह का अनुसरण करते हुए
ईसा मसीह के उपदेश | हमारे लिए आराधना | ईसाई अनिवार्य तत्व